RAJASTHAN K JAN-ANDOLAN
1. बिजौलिया किसान आंदोलन
बिजोलिया का किसान आंदोलन भारत का प्रथम व्यापक, शक्तिशाली व दीर्घावधिक आंदोलन था जो लगभग आधी शताब्दी (1897-1941) तक चलता रहा।
यह अंग्रेजी कंपनी द्वारा सहायक संधि की बदौलत उपजी रियासती शासकों के भोग-विलास और अकर्मण्यता की प्रवृति व कृषक-वर्ग के आर्थिक शोषण के विरोध में उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी।
इस आंदोलन के प्रथम चरण (1897 – 1915) का नेतृत्व पूर्णरूप से स्थानीय था, जब पंचायतों के माध्यम से समानांतर सरकार स्थापित कर उसका सफलतापूर्वक संचालन किया गया।
द्वितीय चरण (1916 – 1922) में नेतृत्व की बागडोर विजय सिंह पथिक के हाथ में आई। पथिक जी ने इस आंदोलन से संबंधित समाचारों को ‘प्रताप’ के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी के सहयोग से पूरे देश में प्रचारित किया। फलस्वरूप यह आन्दोलन तृतीय चरण (1923 – 41) में प्रवेश कर राष्ट्रीय नेताओं के निर्देशन में चला गया था।
बिजोलिया का यह संपूर्ण आंदोलन राष्ट्रीय भावना से प्रेरित था और यह मेवाड़ राज्य की सीमा तक ही सीमित नहीं रहा वरन् राष्ट्रीय स्तर के अन्य किसान आन्दोलनों को भी प्रभावित किया।
इस आंदोलन ने कालांतर में माणिक्यलाल वर्मा जैसे तेजस्वी नेता को जन्म दिया, जो बाद में मेवाड़ राज्य में उत्तरदायी सरकार की स्थापना हेतु अनेक आंदोलनों के प्रणेता बने।
बिजोलिया के ठाकुर ने आंदोलन को निर्ममता पूर्वक कुचलने का प्रयास किया लेकिन कृषक वर्ग ने अभूतपूर्व साहस, धैर्य और बलिदान का परिचय दिया। यद्यपि 1922 में हुए समझौते को क्रियांवित नहीं किया जा सका तथापि अंत में अपने मंतव्य में सफल रहा। टी. राघवाचारी के प्रयासों से इसका पटाक्षेप किसी प्रेरणास्पद कहानी की तरह हुआ।

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